Faiz Ahmed Faiz Poetry

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faiz poetry
faiz poetry

सच है हमीं को आप के शिकवे बजा न थे
बेशक सितम जनाब के सब दोस्ताना थे
हाँ जो जफ़ा भी आप ने की , क़ायदे से की
आखिर हम ही बंदा-ऐ-असूल-ऐ-वफ़ा न थे
आये तो यूँ के जैसे हमेशा थे मेहरबान
भूले तो यूँ के गोया कभी आशना न थे
लब पर है तल्खी-ऐ-मेह-ऐ -आयाम , वरना “फैज़ ”
हम तल्खी -ऐ -कलाम पे मेल ज़ारा न थे

faiz ahmed faiz ghazals
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कभी गम की आग में जल उठे
कभी दाग़ -ऐ -दिल ने जला दिया
ऐ जनून-ऐ-इश्क़ बता ज़रा
मुझे क्यों तमाशा बना दिया
गम-ऐ -इश्क़ कितना अजीब है
यह जनून से कितना करीब है

मेरा कह रहा है तजुर्बा
उससे ज़िन्दगी की है आरज़ू
मुझे ज़िन्दगी ने मिटा दिया

faiz ahmed faiz poetry
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दोनों जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब् -ऐ -गम गुज़ार के
बीरान है महकदा , ख़म -ओ -सागर उदास है
तुम किया गए के रूठ गए दिन बाहर के
एक फुरसत -ऐ -गुनाह मिली , वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के
भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज फैज़
मत पूछ जलवे दिल -ऐ -नाकारदाकार के

faiz ahmed faiz
faiz ahmed faiz
राज़ -ऐ -उल्फत छुपा के देख लिया
दिल में बहुत कुछ जला के देख लिया
और क्या देखने को बाकी है
आप से दिल लगा के देख लिया
वो मेरे हो के भी मेरा न हुआ
उन को अपना बना के भी देख लिया
आज उनकी नज़रो में कुछ हमने
सब की नज़रें बचा के देख लिया
“फैज़” तकमील -ऐ -ग़म भी न हो सके
इश्क़ को आजमा के भी देख लिया
faiz shayari
faiz shayari
बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा
इस ज़ख़्म को हम ने कभी सिलते नहीं देखा
इक बार जिससे छट गयी धुप की ख्वाहिश
फिर शाख पे उस फूल को खिलते नहीं देखा
यक लख्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं
जिस पेड़ को आंधी में भी हिलते नहीं देखा